पृष्ठ

समर्थक

गुरुवार, 28 जून 2012

हँसी





दुख रुपी परतो के अवरण में
फँसी ये हँसी 
चीखती हैचिल्लाती है...
कर दो आजाद मुझे
दुख डर की..
सलाखो को निहारती ये हँसी...
मौन हो मन ही मन बुदबुदाती
कर दो आजाद अब तो मुझे
तभी दुखी परते सुन ये बुदबुदाहट
फैलाती है अपने पँख
ओर ले लेती है फिर
अपनी ओट मे..
मौन के सन्नाटे मे फिर..
खत्म हुआ अस्तित्व 
 इस हँसी का

Anjanna

चित्र गूगल साभार 

12 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर रचना !!
    सुख हो या दुःख मुस्कराहट बनी रहनी चाहिए .....

    उत्तर देंहटाएं
  2. दुःख जब जब आता है ... हंसी ले जाता है अपने पंखों में ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. संगीता स्वरुप ( गीत )जी, आप की टिप्पणी स्पैन मे चली गई थी इसलिए प्रकाशित नही कर पाई ।लेकिन आप के कहने पर टेक्स्ट का बैक ग्राउंड बदल दिया है । उम्मीद है आप को अब पढने मे कोई परेशानी नही होगी । आभार...

    उत्तर देंहटाएं
  4. आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद...

    उत्तर देंहटाएं
  5. मौन ...कभी बुरा कभी भला

    शुभकामनायें आपको ...

    उत्तर देंहटाएं